1,11,111 Ayambil

Ayambil

हमारे जैन शास्त्रोंमें कहा गया है कि जो भी आयंबिल की तपस्या करता हे, उसके विघ्न दूर हो जाते हे और मनोवांछित सिद्धि प्राप्त होती हे। जब द्वारिकानगरी को श्री द्वैपायन ऋषि के प्रकोप से द्वारिकानगरी को बचाने के लिए लोग आयंबिल की आराधना करते थे जिससे १२ साढ़े १२ वर्ष तक द्वारिका नगरी को श्री द्वैपायन ऋषि क्षति नहीं पहोंचा शके और आयंबिल के प्रभाव से समग्र नगरी का रक्षण होता था। आज भी जिनशासन में भाविक गण आयंबिल की खूब आराधना करते हैं। आयंबिल एक महामंगल है और विघ्नविनाशक है।

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प.पू. दादागुरुदेव आचार्य श्रीमद्विजय लब्धि सूरीश्वरजी म. सा. के दिव्याशीष प. पू. गुरुदेव आचार्य गीतार्थ श्रीमद्विजय विक्रम सूरीश्वरजी म. सा. की दिव्य कृपा से प. पू. गच्छाधिपति गुरुदेव श्रीमद्विजय राजयश सूरीश्वरजी म. सा. की प्रेरणा से और सदउपदेश से प. पू. प्रवर्तिनी साध्वीवर्या वाचंयमा श्रीजी म. सा. (प. पू. बेन म. सा. ) की पावनप्रेरणा से तथा जिन शाशन के समस्त श्रमण श्रमणी भगवंतो के परम पावन निश्रा में हमने विश्व शांति एव जैन धर्म के गौरव और एकता के लिए विश्व मे सर्व प्रथम बार १,११,१११ आयंबिल सामूहिक विराट आराधनाका शुभ आयोजन किया है।

पूज्यपाद गीतार्थ गच्छाधिपति गुरुदेव राज्ययशसूरीश्वरजी महाराज साहब के आदेश, उपदेश,एवं शाषन प्रभावक कार्यो की जानकारी देने के लिए हमने यह वेबसाइट का निर्माण किया हे। इसके द्वारा जिन भक्ति, गुरुभक्ति, साधर्मिक भक्ति, श्रुत भक्ति, जीवदया, अनुकंपा, शिक्षण, मेडिकल आदि शुभकार्य मात्र जैन ही नहीं परंतु 18 वर्ण और 36 कॉम (सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय) केलिए उपयोगी बनेग। विश्व के हर कोने में शांति का साम्राज्य स्थापित करने की मंगल भावना से इस वेबसाइट को बनाया है। मात्र जैन ही नहीं, अपितु जैन प्रेमीको भी निवेदन हे की आषाढ़ सुद अगियारस, रविवार 10 जुलाई को विश्व शांति के उद्देश्य से पूरे विश्व में 1,11,111 आयंबिल की आराधना होगी, उसमे आपभी सहभागी बने । कोरोना की वैश्विक महामारी दुनिया भर में फैल गई है, वह शांत हो जाए, और कोई भी आधि-व्याधि-उपाधि उत्पन्न ना हो और सभी को समाधि की प्राप्ति हो ऐसी मंगलमय भावना से यह अनुष्ठान किया जा रहा है।

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What is Ayambil?

भगवान ने हमें तपस्या के कई मार्ग बताए हैं। जैसे नवकारसी, पोरसी, बियासना, एकासना, उपवास आदि। आयंबिल उन्हीं में से एक है। आयंबिल तप का मतलब हे दिन में सिर्फ एक ही बार भोजन करना। वह भी घी - तेल - दूध - चाय - सब्जी- मेवा - मिठाई इत्यादि के सिवाय का आहार लेना। पानी भी दिन में सूर्योदय के बाद ही उबला हुआ पीना होता हे। यदि कोई जन्म से भी जैन न हो, तो वह भी व्यक्ति आयंबिल कर सकते है।आयंबिल की तपस्या रसनेद्रिंय पर विजय प्राप्त करने के लिए करते हैं। अपना पेट भरने के लिए एक स्थान पर बैठकर दिन में सिर्फ एक बार लूखा-सुखा आहार करना। हम भी आयंबिल की तपस्या की श्रृंखला में जूड़कर महान कर्मों की निर्जरा करने का प्रयास करेंगे। भगवान ने इच्छा के निरोध में ही सुख कहा है और हमारा अंतिम लक्ष्य तो मोक्ष सुख को प्राप्त करना ही है। आयंबिल के तपस्वी की अनुमोदना कर के आप खुद भी आयंबिल में जुड़ जाइये। तभी कर्मो की निर्जरा होगी। आयंबिल तप का फॉर्म भरने के लिए Register Now पे जाये।

  • उपवास से क्षुधा पर विजय होती है।
  • आयंबिल से पाँचो इन्द्रियों के विकार नष्ट होते है।

जैन धर्म में समूह निरंतर आयंबिल के दो तप प्रसिद्द है :

  1. नवपदजी की शाश्वत ओली
  2. वर्धमान तपकी ओली

  • नवपदजी की ओलीमें लगातार (नव) नौ आयंबिल करने होते है।
  • वर्धमान तप के 1 से 100 तक ओली 5050 आयंबिल से पूर्ण होती है।

"आप सज्ज हो जाये.... आपको सिर्फ एक ही आयंबिल करके एक लाख ग्यारह हजार एक सौ ग्यारह आयंबिल के अभियान में सहभागी बनना है।"

याद रहे - 10/07/2022, आषाढ़ सुदी - 11, रविवार